Saturday, July 16, 2022

अनंत कविता

 हर एक वीराने की एक कहानी होती है, जो उस खामोशी में ज़ोर ज़ोर से चीखे मारती है, पर सुनने के लिए सिर्फ रह जाता है एकांत, जो ज़मीन आज बंजर है, इतिहास में कभी उपजाऊ रहा होगा, उसमे समाए होंगे हरे भरे बीज, वही बीज कुछ समय बाद मिट्टी बन गए और वो मिट्टी अब रह गई मात्र धूल, उस धूल पर पांव रखने पर मस्तिष्क में दौड़ती हैं कहानियां, कुछ मेरी, कुछ तुम्हारी, कुछ हमारी, कुछ इस एकांत की। 

ये एकांत शरीर में एक ठिठुरन पैदा करता है मेरे नाभि से ऊपर, दिल के आस पास कहीं और फिर तुम्हारे बारे में एक नई कहानी पैदा होती है।

कहानियां अमर होती हैं, बदलता है तो बस उनका ढंग, उनका अंदाज़, वही कहानी बदल के एक नई कहानी का स्वरूप लेती है और ऐसे ही एक कहानी के हजारों स्वरूप हो जाते हैं, पर हम सब चाहते हैं की हमारी सिर्फ एक ही कहानी रहे जिसका हर एक मोड़ हमारी निगरानी पर चले, जो की संभव नहीं। फिर में खुद से सवाल करता हूं की कहानियां होती ही क्यों हैं जब वे बदल जाती हैं, लेकिन फिर थक हार कर मैं खूब विचार करता हूं एकांत में।  

ये एकांत शरीर में एक ठिठुरन पैदा करता है मेरे नाभि से ऊपर, दिल के आस पास कहीं और फिर तुम्हारे बारे में एक नई कहानी पैदा होती है।

जिस कोरे कागज़ पर मैं ये सब लिख रहा हूं, ये कागज़ भी एक दिन मेरे पांव के नीचे दबी धूल बन जाएगी, हां यही कागज़ जिस पर लिखते वक्त मैं तुम्हारी आंखें यथार्थ रूप में देख पा रहा हूं। ये कागज़, ये आंखे, कहीं खो तो नही जाएंगी न ? क्या यह फिर एक नई कहानी बनेगी? जैसे जैसे मैं इस कागज़ पर उंगलियां फेर रहा हूं, मुझे मेरी और तुम्हारी हर एक मुलाकात याद आ रही है। ये कागज़ मुझे अब जान से भी प्यारा है, पर, पर ये कागज़ कहीं धूल तो नही बन जाएगा न? कहीं मैं, तुम, हम अर्थ हीन तो नहीं?.... ये सवाल मुझे मुझसे दूर एकांत में ले जाता है। 

ये एकांत शरीर में एक ठिठुरन पैदा करता है मेरे नाभि से ऊपर, दिल के आस पास कहीं और फिर तुम्हारे बारे में एक नई कहानी पैदा होती है।

तुम मेरी सबसे खूबसूरत कहानी हो, जिसको मैंने खूब सजा कर लिखा, हालांकि मेरे शब्द टेढ़े मेढे होते हैं पर तुम्हारे विचार मात्र से वे शब्द अपने आप खूबसूरत हो जाते हैं, मैने इस कहानी पर बहुत समय बिताया है, ये कहानी सिर्फ कहानी नहीं मेरे शरीर का एक अंग है जिसके बिना मैं विकलांग हूं। इस कहानी को मैने तुम्हारे विचारो के बीज डालकर उसमें प्रेम का पानी डालकर सींचा है और मैं चाहता हूं की उसमे तुम्हारे होठ जीतने खूबसूरत फूल लगे, जिन्हे मैं अपने भगवान को चढ़ाऊं, पर, पर क्या वो फूल एक दिन मुरझा जाएगा? क्या मेरी कहानी बदल जाएगी? क्या तुम मुझसे अलग हो जाओगी? क्या मैं विकलांग हो जाऊंगा?

  ये सवाल मुझे मुझसे दूर एकांत में ले जाते हैं।

ये एकांत शरीर में एक ठिठुरन पैदा करता है मेरे नाभि से ऊपर, दिल के आस पास कहीं और फिर तुम्हारे बारे में एक नई कहानी पैदा होती है।

मैं सिर्फ एक कहानी चाहता हूं, सिर्फ एक, जो की संभव है भी और नहीं भी। जब हम लिखते हैं तो कुछ विचार कागज़ पर नहीं उतर पाते, वे कहीं छिप जाते हैं वैसे ही मैं चाहता हूं कि मेरी इस कहानी में हम दोनो को छोड़कर बाकी सारे पात्र कहीं छिप जाएं। मैं चाहता हूं की हमारे कहानी की दो हिस्से हो, एक मैं और एक तुम और वो दो हिस्से तब मिले जब मैं और तुम, हाथ पकड़कर बादलों में चलें, वो दो हिस्से आपस में घुल जाएं तब, जब मैं तुम्हारे गोद में सिर रख तुम्हारे कान के ऊपर से आती हुई बाल की लट को निहारूं, वो दो हिस्से धीरे धीरे एक बन जाएं, तब, जब मैं तुम्हे आलिंगन में कसकर तुम्हारी आंखों में गिर कर खो जाऊं,

 पर अगर ये भी कहानी तो इसका भी अंत होगा, ये भी नई कहानी बनेगी, जो मेरी सेहत के लिए हानिकारक है, मैं तुम्हारी मेरी कहानी को सबसे दूर रखना चाहता हूं, जहां इसका अंत न हो, मैं चाहता हूं मेरी ये कहानी बन जाए अनंत। पर ऐसा होगा कैसे?

 ये सवाल मुझे मुझसे दूर एकांत में ले जाता है।

ये एकांत शरीर में एक ठिठुरन पैदा करता है मेरे नाभि से ऊपर, दिल के आस पास कहीं, पर इस बार कोई नई कहानी पैदा नहीं हुई।

ये कागज़ कितनी कहानियां समेट पाएगा? कितने शब्द? कुछ शब्दों के बाद ये कागज़ खत्म हो जाएगा, पर मैं चाहता हूं की हमारी कहानी अनंत हो। 

तुम मेरी कविता हो, मैं तुमको ऐसा का ऐसा ही देखना चाहता हूं, भले ही कल देखूं या, प्रलय के दिन। मैं चाहता हूं की हर बार जब भी मैं तुम्हारी आंखों में देखूं मैं उनमें गिरकर खो जाऊं, ये कहानी में संभव नहीं, इसलिए अब से तुम मेरी कविता हो, जिसको मैं कभी भी लिखूं, कभी भी पढूं, पर उसका रस एक सा हो, तुम्हारी आंखे एक सी हो, फिर कागज़ कभी धूल नही बनेगा, अगर कुछ बनेगा तो आसमान जिस आसमान के बादल में मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हे कोई कविता सुनाऊंगा। 

तुम मेरी कविता हो जिसका कोई अंत नहीं, जो सदैव चलेगी, जिसको मैं हर घड़ी लिखता रहूंगा, जबतक शरीर में प्राण हैं।


 तुम मेरी अनंत कविता हो, जो कभी नही बदलेगी। 


अब मुझे इस कागज़ का कोई काम नहीं, मैं निडर हूं, अब मुझे किसी कहानी के खत्म होने की या उस के बदल जाने का कोई डर नहीं क्योंकि तुम मेरी कविता हो। इस कागज़ को में फेंक रहा हूं, और अब मैं नई कविता रच रहा हुं, जिसको कागज़ की जरूरत नहीं, ये कविता मैं इन हवाओं के ज़रिए तुमको सुना रहा हूं, तुम सुन रही हो न? 

मेरे नाभि के ऊपर तितलियां घूम रही हैं, दिल के आसपास कहीं, शायद यही प्रेम है, अब कोई एकांत नहीं।

अनंत कविता

  हर एक वीराने की एक कहानी होती है, जो उस खामोशी में ज़ोर ज़ोर से चीखे मारती है,  पर सुनने के लिए सिर्फ रह जाता है एकांत, जो ज़मीन आज बंजर ह...